शेखचिल्ली का नुकसान

By | 25th February 2019

एक दिन शेखचिल्ली की अम्मी ने उससे कहा, ‘बेटे, अब तुम जवान हो गए हो। अब तुम्हें कुछ काम-काज करना चाहिए।’ ‘क्या काम करूँ?’ शेखचिल्ली ने पूछा। ‘कोई भी काम करो।’

 

‘मेरी तो समझ में नहीं आता, अम्मी कि मैं क्या काम करूँ? मैं तो किसी तरह की दस्तकारी भी नहीं जानता।’ ‘बेटे, तुम्हारे अब्बाजान अब बूढ़े हो गए हैं। तुम्हें कोई-न-कोई काम-धंधा जरूर करना चाहिए।’ ‘तुम ऐसा कहती हो तो ठीक है। मैं काम की तलाश में जाता हूँ।’ ‘जाओ।’ अम्मी ने कहा।

 

‘जा रहा हूँ। पर मुझे बढ़िया- सा खाना खिलाओ। मैं खा-पीकर ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली बोला।

 

‘अभी बनाए देती हूँ।’ अम्मी ने उत्तर दिया। शेखचिल्ली की माँ ने उसके लिए बढ़िया-बढ़िया पकवान बनाए और उन्हें खिला-पिलाकर उसे नौकरी की तलाश में भेज दिया। शेखचिल्ली मस्ती में झूमता हुआ घर से निकल पड़ा। उसके दिमाग में नौकरी या मजदूरी के सिवा कोई बात नहीं थी।

 

वह घर से बहुत दूर निकल गया। एक जगह रास्ते में उसे एक सेठ मिला। वह घी का हंडा सिर पर लिए जा रहा था। बोझ के कारण सेठ के कदम लड़खड़ा रहे थे। सेठ ने उसे देखते ही कहा, ‘ए भाई! मजदूरी करोगे?’ ‘बिलकुल करूँगा। बंदा तो मजदूरी की तलाश में है ही।’ ‘तो मेरा यह हंडा ले चलो। इसमें घी है। घी बिखर न जाए! तुम इसे मेरे घर तक पहुँचा दोगे तो मैं तुम्हें एक अधन्ना दूँगा।’

 

‘सिर्फ एक अधन्ना!’ चिल्ली ने पूछा। ‘हाँ,’ सेठ ने उत्तर दिया। ‘लाओ सेठजी, मैं ही लिए चलता हूँ। पहली बार मजदूरी कर रहा हूँ, दो पैसे कम ही सही।’ शेखचिल्ली ने कहा। और उसने सेठ का घी से भरा हुआ वह बड़ा बर्तन अपने सिर पर रख लिया। सिर पर घी का बर्तन रखकर शेखचिल्ली उस सेठ के साथ चल दिया।

 

चलते-चलते शेखचिल्ली सोचने लगा, यह सेठ मुझे दो पैसे देगा। दो पैसे यानी आधा आना। आधा आना यानी कि दो पैसे।

 

उनमें एक मुर्गी और एक मुर्गे का चूज़ा खरीदा जा सकता है। वे चूज़े बड़े होंगे। एक बड़ी मुर्गी और मुर्गा। मुर्गी अंडे देगी। वह रोज अंडे देगी। खूब चूज़े बनेंगे। कुछ दिनों में बहुत-सी मुर्गियाँ हो जाएँगी। ढेरों मुर्गियाँ हो जाएँगी तो वे और अंडे दिया करेंगी। अंडे बेचने से मुझे बहुत आमदनी होगी।

 

फिर तो पैसों की कमी ही नहीं रहेगी। अपने लिए एक शानदार घर बनाऊँगा। बहुत-सी जमीन खरीदूँगा। भैंसे खरीदकर डेरी बनाऊँगा। दूध बेचूँगा। दूध और अंडों का थोक व्यापारी बन जाऊँगा तो पूरे इलाके में मेरी धाक जम जाएगी। सब लोग मेरा माल पसंद करेंगे और खरीदेंगे। व्यापार चल निकलेगा।

 

__PAGEBREAK__

 

 

 

मैं दौलतमंद बन जाऊँगा। जब पास में दौलत हो जाएगी तो सैकड़ों लोग अपनी बेटियों के रिश्ते लेकर आएँगे। मैं किसी राजा साहब की बेटी से शादी करूँगा। माँ भी क्या याद करेगी! बेटे ने कितनी तरक्की कर ली। तरक्की तो करनी ही है। हर चीज में करनी है।

 

धन में भी और जन में भी। यानी जब बीवी होगी तो बच्चे भी जरूर होंगे। बच्चे एक दर्जन से कम नहीं होने चाहिए। पड़ोसी के आठ बच्चे हैं। ज्यादा होने इसलिए जरूरी हैं कि कभी झगड़ा हो गया तो मेरे बच्चे पिटेंगे नहीं। उसके बच्चों को ही पीट लेंगे। लेकिन पड़ोसी के बच्चे तो आपस में लड़ते हैं। तो क्या मेरे बच्चे भी आपस में लड़ेंगे? जरूर लड़ेंगे।

 

जब लड़ेंगे तो रोएँगे, शोर करेंगे। मेरे पास अपनी शिकायतें लाएँगे। मैं परेशान हो जाऊँगा। तब मेरा वह भी खराब हो जाएगा। वह जो बड़े आदमियों का अक्सर खराब रहता है, यानी वही, जो बड़े आदमी कहते हैं कि उनका बिगड़ गया। मैं भी तो बड़ा आदमी बन जाऊँगा उस वक्त तक। इसलिए मेरा भी वो खराब हो जाएगा। बच्चों के शोर, झगड़े और अपने पास शिकायत लेकर आने से। लेकिन वो जो होता है उसका नाम तो याद नहीं आ रहा। क्या इस सेठ से पूछ लूँ?

 

नहीं-नहीं! मैं इतना बड़ा आदमी हो गया हूँ। अब क्या एक मामूली शब्द भी औरों से पूछूँगा? नहीं पूछूँगा। याद करता हूँ। जब बच्चे शोर करते आएँगे। ‘अब्बा टुन्नी ने मेरा कुर्ता फाड़ डाला।’ ‘अब्बाजान, अस्करी ने मेरी आँखों में संतरे के छिलके का रस निचोड़ दिया।’ ‘देखिए अब्बा, यह शमशाद नहीं मानता! मेरी खाल नोचता है।’ ‘शकीला नहीं मानती अब्बा, देखो इसने मेरी कापी फाड़ दी।’

 

सारे बच्चे जब स्कूल में पढ़ेंगे तो कापी और कलम तो उनके पास होनी जरूरी है। होगी भी। और जब होगी तो वे फाड़ेंगे-तोड़ेंगे भी। एक दूसरे में छीनेंगे भी। हाथापाई होगी। वे आकर मुझसे शिकायतें करेंगे।

 

मैं जब अपने आलीशान सजे हुए कमरे में गद्दों पर बैठा, तकिए के सहारे लेटा, अपने नलीदार चाँदी के हुक्के को पी रहा हूँगा। और मेरे बारह बच्चे आकर मेरा ध्यान बँटा देंगे तो मेरा वो…

 

..हाँ, अब याद आया……….मूड कहते हैं उसे। वो खराब हो जाएगा। मूड………यह मूड शब्द कितनी देर में याद आया। यही खराब हो जाएगा। यह मूड भी बड़े आदमियों का अक्सर खराब हो जाता है। मैं बड़ा आदमी हूँ। मेरा मूड जब एकदम उखड़ेगा तो मैं बड़े जोर से बच्चों को अँग्रेजी में डाँटूँगा-‘शटअप!’

 

उसने ‘शटअप’ इतने जोर से उछलकर कहा कि उसका पैर रास्ते में पड़ी ईंट से टकरा गया। वह धड़ाम से घी के हंडे समेत जमीन पर गिरा। सारा घी बिखर गया। शेखचिल्ली माथा पकड़कर बैठ गया और चारों और देखते हुए रोने लगा।

 

सेठ का इतना घी बिखर गया था फिर भी वह बिना रोए बोला, ‘अरे बदमाश, तन्नै म्हारो इत्तो बड़ो नुकसान कर दियो है। दिके म्हारो पाँच रुपयो को घ्यो बिखेर दियो।’

 

शेखचिल्ली रोते हुए बोला, ‘सेठ जी, तुम्हारा तो पाँच ही रुपए का नुकसान हुआ है। पाँच रुपए तो तुम कमा लोगे। मेरा तो बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। मेरा सारा परिवार खत्म हो गया, मेरा बहुत बड़ा मुर्गी फार्म, बहुत बड़ा डेरी फार्म, महल और एक दर्जन बच्चे, लाखों की जायदाद के साथ खत्म हो गए। मैं इतना बड़ा नुकसान कैसे बर्दाश्त करूँगा। हाय मेरी बीबी! हाय मेरे एक दर्जन बच्चे!’ शेखचिल्ली रोने लगा।

 

उसे रोता देखकर सेठ ने फिर उससे नुकसान का जिक्र नहीं किया और चुपचाप खिसक गया। उसके जाने के बाद शेख ने अपने मगरमच्छी आँसू पोंछे और चुपचाप मुस्कुराते हुए अपनी राह चल दिया। चलते-चलते वह बड़बड़ाया, ‘बड़ा मनहूस सेठ था। उसने मेरी सारी कल्पनाओं का कबाड़ा कर दिया। इतना शानदार सपना देख रहा था। घी के हंडे ने सब सत्यानाश कर डाला।’ अब उसे किसी दूसरी जगह मजदूरी या नौकरी की तलाश थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *