शेखचिल्ली ससुराल में

By | 20th February 2019

शेखचिल्ली नाम का एक लड़का रहता था। उसकी माँ बहुत गरीब थी। शेखचिल्ली का पिता मर चूका था। उसकी माँ बेचारी किसी तरह शेखचिल्ली को पालती-पोसती थी। शेखचिल्ली स्वभाव से नटखट तो था ही, साथ ही वह बेवक़ूफ़ भी था। उसकी बेवकूफी के कारण उसकी माँ को बहुत से उलाहने सुनने पड़ते थे। अंत में एक दिन ऊबकर उसने शेखचिल्ली को घर से निकाल दिया। शेखचिल्ली घर से निकल कर पड़ोस के एक दूसरे गाँव में चला गया। वहां उसने एक झोंपड़ी बनायी और रहने लगा। उसका स्वभाव बहुत ही खुशदिल था इसलिये गाँव के लोग उसके मित्र हो गए। उन्होंने उसकी बड़ी मदद दी और उसका रोटी-पानी का खर्च चलने लगा। उसकी जिन्दादिली गाँव के मुखिया की लड़की रजिया उस पर आशिक हो गई। गाँव के कुछ नौजवान भी शेखचिल्ली के हिमायती थे। उन्होंने एक दिन दवाव डालकर मुखिया क़ी लड़की रजिया से उसकी शादी करा दी। शेखचिल्ली को शादी में दान-दहेज़ में बहुत कुछ रूपये तथा जेवरात भी मिले। शेखचिल्ली अपनी औरत तथा शादी में मिले हुए रूपये और जेवरात लेकर अपने गाँव वापिस लौट आया।

 

गाँव में लौटकर शेखचिल्ली अपनी माँ से मिला तथा बोला-माँ देख। मैंने मुखिया की लड़की से शादी कर ली है। शेखचिल्ली की माँ ने देखा क़ी बेटा बगल के गाँव बाले मुखिया की लड़की से शादी कर लाया है। उसकी माँ ने यः भी देखा क़ी शेखचिल्ली दहेज़ में बहुत-सी दौलत तथा समान इत्यादि ले आया है, तो वह मन ही मन बहुत खुश हो गई। परन्तु वह जानती थी कि शेखचिल्ली एक बिलकुल बेकार लड़का है। इस्कू पैसा कमाने का कोई भी हुनर मालुम नहीं। इसलिये वह कहने लगी- “बेटा तू महालानतो आदमी है। तेरे किये कुछ भी होने का नहीं।”

 

यह सुनकर शेखचिल्ली ने कहा- “माँ! मैंने इतना बड़ा काम किया है। क्या यह कम है?”

 

उसकी माँ ने कहा- “बेटा ! यह बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया है। तू अगर अपने मन से जान-बूझकर कोई काम करे और उसमें कोई तरक्की करके चार पैसे कमाकर ला सके तो मैं जानू। तू मुझे बुढापे में सुख नहीं दे सकता।”

 

यह सुनकर शेखचिल्ली ने कहा- “माँ तू ऐसा मत बोल मैं वक़्त आने पर तेरे लिये कुछ कर सकता हूं।”

 

इसी तरह कुछ और वक़्त बीत गया। उसकी औरत नैहर चली गयी और एक साल बीत गया। एक दिन उसने ससुराल जाने की ठान ली। मान से पुचा-अम्मीजान मेरी ससुराल कहाँ है? मुझे उसका पता बताओ, ताकि मैं वहां एक बार हो आऊं मैं भूल गया हूँ। इस पर उसकी माँ ने कहा-बेटा तुझमे अक्ल तो है ही नहीं। इसलिये अगर मैंने पता बताया तो तू भूल जाएगा। इसलिये मेरी बात का ख़याल रखे तो सीता अपने ससुराल पहुँच जाएगा। यह कहकर उसने कहा- “बेटा तू सीधा अपनी नाक की सीध में चले जाना, कहीं से इधर-उधर मुड़ना नहीं, बस सीधे अपनी ससुराल पहुँच जाएगा।” यह सुनकर शेखचिल्ली सीधन ससुराल को चल दिया। चलते चलते उसकी माँ ने कहा- “बेटा! जो साग सत्तू घर में था मैंने बाँध दिया है। यह पोटली लेता जा और बूख लगने पर यही साग-सत्तू खा लेना।”

 

शेखचिल्ली अपने घर से चलकर सीधा अपने नाक की सीध में रवाना हुआ। वह जब अपने घर से सीधा मैदान में दो तीन कोस निकल आया, तो सामने एक दरख्त पडा। उसने सोचा-माँ ने नाक की सीध में चलने को कहा था। यह सोचकर वह पेड़ पर चढ़ गया और फिर दूसरी तरफ से उतर फिर नाक की सीच में रवाना हुआ। आगे चलने पर उसे एक नदी मिली। उसने उस नदी को बड़ी मुश्किल से पार किया और आगे चल पड़ा। इसी प्रकार चलता हुआ वह आखिरकार अपनी ससुराल आ पहुंचा। ससुराल पहुँचने पर उसकी भली-भाँती खातिरदारी की जाने लगी। परन्तु उसने साग-सत्तू छोड़कर कुछ भी खाना स्वीकार न किया, क्योंकि उसकी माँ ने ऐसा ही कहा था। रात को बचा-खुचा साग-सत्तू खाकर सो रहा। रात्रि को उसे भूक सताने लगी। अब वह क्या करे? आखिर भूक से ऊबकर वह बहार निकल आया और मैदान में एक दरख्त के नीचे लेट गया। उस पेड़ पर मधुमखियों का एक बहुत बड़ा छत्ता था। छत्ता मधु से इतना ज्यादा भरा हुआ था क़ी उसमें से रात को मधु टपकता था। शेखचिल्ली जब उस वृक्ष के नीचे लेटा। तो ऊपर से उसके बदन पर मधु टपकने लगा। मधु की कुछ बूंदे उसके मूंह में टपकीं तो बह उसे चाटने लगा और बड़ा खुश हुआ। कुछ बूंदे उसके बदन पर भी टपकती रहीं और वह परेशान होकर इधर-उधर करवटें बदलता रहा। शेखचिल्ली बेवक़ूफ़ तो था ही। उसे इस बात का पता नहीं लग सका क़ी आधिर पेड़ पर से क्या चीज उसके बदन पर टपकती है। निदान लाचार होकर वह वहां से उठा और घर के भीतर घुसकर एक कोठरी में जाकर सो रहा। उस कोठरी के अंदर घुनी हुई रूई राखी हुई थी। शेखचिल्ली को नर्म-नर्म रूई मिली तो उसी में आराम के साथ जाकर सो रहा। उसके बदन के चारों और शहद तो लिप्त हुआ था ही, अब धुनी हुए रुई उसी के साथ बदन भर में चारों और चिपक गयी और उसका बदन और उसकी शक्ल अजीब किस्म की हो गयी।

 

सुबह हुई तो शेखचिल्ली की औरत कुछ रुई निकालने उस कोठरी में घुशी। तब तक शेखचिल्ली जाग उठा था। उसको ऐसे रूप में देखकर उसकी औरत चीख उठी उसने हिम्मत बांधकर पुछा तुम कौन हो? शेखचिल्ली ने जोर से डांट कर कहा- ‘चुप’

 

वह बहार भागी और अपनी माँ से जाकर कहा- “अम्मा! उस रूई वाली कोठरी में ‘चुप’ घुस आया है। उसकी शक्ल बहुत भयानक है।”

 

यह सुनकर उसकी माँ ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया। कई लोग उस कोठरी में घुसे। शेखचिल्ली को देखकर सबने पुछा- “तुम कौन हो?”

 

शेखचिल्ली ने फिर चिल्लाकर कहा- ‘चुप’

 

अब तो उसका ऐसा रूप देखकर सबकी सिट्टी-पिट्टी गम हो गयी। सब समझे चुप नाम क़ी कोई भयानक बला घर में घुस आई है। उसे निकालने के लिये किसी सयाने को बुलाना चाहिए। कई एक ओझा मौलवी बुलाए गए। सबने कितने ही मंत्र-जंत्र किए मगर वह चुप नाम की बला नहीं मिकली। आखिर हार कर मौलवियों ने सलाह दी कि आप लोग यह मकान खाली करके किसी दूसरे में चले जाइए, वरना वह बला आप लोगों का सत्यानाश कर देगी। शेखचिल्ली के ससुराल वालों ने यह मकान खाली कर दिया और दूसरे मकान में चले गए। शेखचिल्ली को अवसर मिल गया और वह रात्री के समय उस कोठरी से निकल कर बाहर की ओर भागा। रास्ते में कुछ चोर दिखाई पड़े। आगे एक किसान के बहुत से भेड़ वगैरह बंधे थे। शेखचिल्ली चोरों के दर के मरे उन्हीं भेड़ बकरियों के बीच जा घुसकर बैठ गया। उधर वे चोर भी उसी तरफ आ पहुंचे।

 

चोरों ने केई एक भेड़ों को चुरा लिया। उन्हीं में शेखचिल्ली ने को भी रूई से लिपटा हुआ देख कोई दुम्बा भेड़ समझकर साथ लेकर भाग चले। भागते-भागते वे नदी के किनारे आ पहुंचे। इतने में सुबह होने लगी। उन्होंने सब भेड़ों को जमीन पर पटक दिया। यह देखकर शेखचिल्ली ने कहा- “मुझे थोड़ा धीरे से पटकना।” उसकी आवाज सुनकर चोरों की नानी मर गई। उन्होंने समझा कि यह कोई भेड़ के रूप में भयानक बला है जो कि इस तरह बोलती है। उन्होंने शेखचिल्ली को पानी में फ़ेंक दिया और भाग चले। उधर पानी में शहद घुल जाने के कारण शेखचिल्ली के बदन पर चिपकी हुई रूई साफ़ हो गई उसने बदन मल मल कर स्नान किया और सुबह होते ही ससुराल आया। दूसरे मकान में जाकर अपने ससुर को मिला और पूछा- “आपने मकान क्यों छोड़ दिया।” ससुर ने कहा- “मेरे मकान में कोई ‘चुप’ नाम की बला घुस गई है।”

 

शेखचिल्ली ने झूठ-मूठ जाकर कोई मंत्र पढ़ दिया और फिर कहा- “वह बाला चली गई।” आखिर सब लोग उसी मकान में चले आए। शेखचिल्ली की बड़ी खातिरदारी हुई। वह सस्रुआल में ही रहने लगा। एक दिन उसने ससुर से कहा- “मैं कोई कारोबार करना चाहता हूँ। मुझे एक गाडी बनवा दीजिये। दिन में लकडियाँ काटूंगा और गाडी में लाद कर बाजार में बेचूंगा।” ससुर ने एक बैलगाड़ी बनवा दी। शेक्चिल्ली ने जंगल से लकडियाँ लाने के लिये बैलगाड़ी जोती, बैलगाड़ी लेकर वह चला तो कुछ आगे जाकर गाडी जंगल में चर्र चूं चर्र चूं की आवाज करने लगी। शेख्चिली ने सोचा- “यह मेरे कारोबार का पहला दिन है और यह गाडी साली अपशकुन कर रही है।” आरे की मदद से गाडी को काटकर टुकडे-टुकडे कर दिया तथा उसे वहीं फैंक-फांक कर आगे लकड़ी काटने चल दिया। शेखचिल्ली एक मोटा पेड़ देखकर उसी पर चढ़ गया। एक बहुए ही मोती डाल पर जा बैठा और कुल्हाड़ी से काटकर जब थक गया तो आरा हाथ में उठाकर उसी से उसने उस डाल को काटना शुरू किया। इतने में एक आदमी नीचे गुजरा। उसने जब शेखचिल्ली को डाल काटते देखा तो ठहर गया। गौर से देखने पर उसको मालूम हुआ कि शेख्चिल्ले उसी डाल को डाट रहा था जिस पर कि वह बैठा हुआ है।

 

उसने कहा- “अरे मूर्ख! तू जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा है। इस तरह तू डाल के साथ-साथ खुद भी नीचे गिर जाएगा।”

 

शेखचिल्ली ने कहा- “अरे जा जा! मैं भला जमीन पर कैसे गिर सकता हूँ।”

 

वह आदमी वहीं तहर गया। थोड़ी देर में डाल कट गई और डाल के साथ-साथ शेखचिल्ली भी नीचे आ गिरा। तब शेखचिल्ली उसको कहने लगा- “आप तो बहुत बड़े आदमी मालूम होते हैं। मुझे यह तो बताइये कि मैं कब मरूँगा?”

 

इस पर उस आदमी ने कहा- “मैं यह सब नहीं जानता”, मगर शेखचिल्ली कहाँ छोड़ने वाला था। उसने उसका पीछा पकड़ लिया तो उसने छुड़ाने के लिये कहा- “तू आज शाम को मर जाएगा।” यह कहकर वह आदमी तो चला गया। अब शेखचिल्ली ने सोचा कि मुझे आज शाम को मर ही जाना है तो अच्छा है कि पहले से ही कब्र के अंदर लेट जाऊं ताकि मेरे मरने के बाद मेरे रिश्तेदारों को कब्र खोदनी न पड़े। ऐसा सोचकर वह उसी जंगल में एक गड्ढा खोदकर उसमें लेट रहा। उसी तरफ से एक आदमी जा रहा था। उसके पास एक मटका था। वह आवाज लगाता जा रहा था कि अगर कोई इस मटके को मेरे घर तक पहुंचा दे तो मैं उसे दो पैसे दूंगा। यह सुनकर शेखचिल्ली झटपट कब्र के अंदर से उठकर खडा हुआ और कहने लगा- “लाओ! मैं तुम्हारा मटका ले चलता हूँ।” यह सुनकर उस आदमी ने वह मटका शेखचिल्ली के हवाले किया। शेखचिल्ली उसे लेकर चल पडा। रास्ते में यह सोचता जा रहा था कि मुझे उसकी मजदूरी के दो पैसे मिलेंगे। दो पैसे का एक अंडा खरीदूंगा उसे अंडे से मुर्गी पैदा होगी। उस एक मुर्गी से बहुत सी मुर्गियां पैदा होंगी। उन मुर्गियों को बेचकर एक बकरी खरीद लूंगा। बकरी से बहुत सी बकरियां होंगी उन बकरियों को बेचकर एक गाय खरीदूंगा। उस गाय से बहुत सी गायें पैदा होंगी। उन्हें बेचकर घोडी से बहुत सी घोड़ियाँ पैदा होंगी। उन सबको बेचकर बहुत से रूपये मिलेंगे। तब मैं अपना मकान बनाऊंगा। फिर एक घोड़े पर बैठकर बाजार में सैर करने निकालूँगा। फिर कारोबार करके बहुत सी दौलत पैदा करूंगा। फिर घर में ठाठ से शाम को बैठक में हुक्का गुद्गुदौंगा, औरत बच्चों को मेरे पास खाना खाने के लिये भेजेगी। उस वक्त मैं हुक्का गुडगुडाते हुए जोरों से सिर हिलाकर कहूंगा- “अभी खाना नहीं खाउंगा।” शेखचिल्ली ने ज्योंही अपने ख्यालों में जोरों से सिर हिलाया कि वह मटका सिर पर से गिरकर फूट गया और अंदर का सारा सामान मिट्टी में गिरकर खराब हो गया। इस अपर उस आदमी ने शेखचिल्ली की अच्छी खासी मरम्मत की। शेखचिल्ली का सपना टूट गया।

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