सांच को आंच नहीं

By | 20th February 2019

किसी नगर में एक जुलाहा रहता था| वह बहुत बढ़िया कम्बल तैयार करता था| कत्तिनों से अच्छी ऊन खरीदता और भक्ति के गीत गाते हुए आनंद से कम्बल बुनता| वह सच्चा था, इसलिए उसका धंधा भी सच्चा था, रत्तीभर भी कहीं खोट-कसर नहीं थी|

 

एक दिन उसने एक साहूकार को दो कम्बल दिए| साहूकार ने दो दिन बाद उनका पैसा ले जाने को कहा| साहूकार दिखाने को तो धरम-करम करता था, माथे पर तिलक लगाता था, लेकिन मन उसका मैला था| वह अपना रोजगार छल-कपट से चलाता था|

 

दो दिन बाद जब जुलाहा अपना पैसा लेने आया तो साहूकार ने कहा – “मेरे यहां आग लग गई और उसमें दोनों कम्बल जल गए अब मैं पैसे क्यों दूं?”

 

जुलाहा बोला – “यह नहीं हो सकता मेरा धंधा सच्चाई पर चलता है और सच में कभी आग नहीं लग सकती|

 

जुलाहे के कंधे पर एक कम्बल पड़ा था उसे सामने करते हुए उसने कहा – “यह लो, लगाओ इसमें आग|”

 

साहूकार बोला – “मेरे यहां कम्बलों के पास मिट्टी का तेल रखा था| कम्बल उसमें भीग गए थे| इस लिए जल गए|

 

जुलाहे ने कहा – “तो इसे भी मिट्टी के तेल में भिगो लो|”

 

काफी लोग वहां इकट्ठे हो गए| सबके सामने कम्बल को मिट्टी के तेल में भिगोकर आग लगा दी गई| लोगों ने देखा कि तेल जल गया, लेकिन कम्बल जैसा था वैसा बना रहा|

 

जुलाहे ने कहा – “याद रखो सांच को आंच नहीं|”

 

साहूकार ने लज्जा से सिर झुका लिया और जुलाहे के पैसे चुका दिए|

 

सच ही कहा गया है कि जिसके साथ सच होता है उसका साथ तो भगवान भी नहीं छोड़ता|

 

 

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